22-25 किमी
पुंछ नगर से दूरी
पीर पंजाल
पर्वतीय और घाटी परिवेश
सावन केंद्र
मुख्य यात्रा काल
सेवा परंपरा
लंगर, मार्गदर्शन और सहयोग

श्री बाबा बुढ़ा अमरनाथ यात्रा — तिथिवार कार्यक्रम

आधार शिविर: यात्री निवास, भगवती नगर, जम्मू  |  16 अगस्त से 27 अगस्त 2026

बाबा बुढ़ा अमरनाथ यात्रा 2026 — तिथिवार कार्यक्रम तालिका

यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है

मंदिर, परिवेश और यात्रा की आध्यात्मिक अनुभूति का संक्षिप्त परिचय।

स्वयंभू शिवलिंग

यह धाम अपने पूज्य श्वेत पाषाण स्वरूप शिवलिंग के कारण अत्यंत श्रद्धा का केंद्र माना जाता है।

चार दिशाओं का धाम

मंदिर परंपरा में चारों दिशाओं से खुलापन, स्वागत और साझा आस्था का प्रतीक भाव दिखाई देता है।

पवित्र जलधारा

पुलस्त्य नदी और पवित्र जल से जुड़ी स्मृतियाँ यात्रा को स्नान, शुद्धि और दर्शन की भावना से जोड़ती हैं।

यात्री सेवा

लंगर, सामूहिक सेवा, मार्गदर्शन और स्थानीय सहयोग इस यात्रा को जीवंत और आत्मीय बनाते हैं।

बाबा बुढ़ा अमरनाथ मंदिर

नदी किनारे स्थित एक शांत और पवित्र शिवधाम

यह मंदिर मंडी, पुंछ के राजपुरा क्षेत्र से जुड़ा हुआ है और पीर पंजाल के सुंदर प्राकृतिक परिवेश में स्थित है। श्रद्धालु यहाँ पहुँचने से पहले ही घाटी, जलधारा और पर्वतीय वातावरण से एक आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।

बाबा बुढ़ा अमरनाथ की परंपरा श्वेत पाषाण शिवलिंग, विशाल मंदिर संरचना और चारों दिशाओं से खुले आध्यात्मिक स्वागत के भाव से जुड़ी हुई मानी जाती है।

जल, पहाड़ी प्रकाश, भजन, भगवा ध्वज और यात्रियों की उपस्थिति मिलकर इस धाम को केवल एक दर्शनीय स्थान नहीं बल्कि एक जीवित धार्मिक अनुभव बनाती है।

इस स्थान की पवित्रता केवल मंदिर में नहीं, बल्कि यात्रा, सेवा और पूरे परिवेश में महसूस होती है।

बाबा बुढ़ा अमरनाथ यात्रा का वास्तविक अनुभव

ऐसी विशेषताएँ जो पहली बार आने वाले और बार-बार लौटने वाले दोनों प्रकार के श्रद्धालुओं को गहराई से प्रभावित करती हैं।

सावन यात्रा

सावन के समय यह यात्रा अधिक श्रद्धालुओं, संतों और समूहों के साथ विशेष रूप से जीवंत हो उठती है।

सुगम पर्वतीय यात्रा

कठिन ऊँचाई वाले मार्गों की तुलना में यह यात्रा अनेक परिवारों और वरिष्ठ श्रद्धालुओं के लिए अधिक सुलभ मानी जाती है।

छड़ी मुबारक परंपरा

पुंछ से निकलने वाली छड़ी मुबारक यात्रा को एक जीवित धार्मिक परंपरा से जोड़ती है।

मंदिर और घाटी दृश्य

पीर पंजाल की पृष्ठभूमि, नदी किनारा और मंदिर परिसर यात्रा को आध्यात्मिक और दृश्यात्मक दोनों रूप से यादगार बनाते हैं।

यात्रा को समझने का एक सरल मार्ग

अधिकांश श्रद्धालु यात्रा, स्नान, दर्शन और सामुदायिक सहभागिता के क्रम से इस धाम का अनुभव करते हैं।

1
पुंछ और मंडी पहुँचे

जम्मू से पुंछ पहुँचकर आगे मंडी की ओर बढ़ें, जहाँ मंदिर और यात्रा का मुख्य वातावरण दिखाई देता है।

2
पवित्र जल से जुड़ें

कई श्रद्धालु दर्शन से पहले नदी या पवित्र जलधारा के साथ शुद्धि और मानसिक तैयारी का अनुभव करते हैं।

3
मंदिर में प्रार्थना करें

दर्शन, शांत ध्यान, अभिषेक और मंदिर परिसर में समय बिताना इस यात्रा का मूल आध्यात्मिक केंद्र है।

4
साझा यात्रा वातावरण में जुड़ें

लंगर, सेवा दल, स्थानीय सहयोग और समूह यात्रा इस तीर्थ को सामूहिक आध्यात्मिक अनुभव बना देते हैं।

मंदिर, घाटी, अनुष्ठान और यात्रियों की गति

मंदिर प्रवेश
यात्रा महासभा
लंगर सेवा
यात्रा सभा
नदी तट

यात्रा की जीवंत झलकियाँ — श्रद्धा, सेवा और उत्साह

बाबा बुढ़ा अमरनाथ यात्रा को अविस्मरणीय बनाने वाले कुछ पल।

यात्रा बस प्रस्थान पूजा
यात्रा बस प्रस्थान पूजा
वाहन पूजा एवं तिलक
वाहन पूजा एवं तिलक
यात्रा महासभा
यात्रा महासभा

बाबा बुढ़ा अमरनाथ — पवित्र झलकियाँ

इन भक्तिमय वीडियो के माध्यम से इस प्राचीन धाम के दिव्य वातावरण का अनुभव करें।

श्री बूढ़ा अमरनाथ की प्राचीन कथा

महाऋषि पुलस्त की तपस्या से लेकर रानी चन्द्रिका के दिव्य मार्गदर्शन तक — इस पवित्र नाम की उत्पत्ति।

लंका महाराज रावण के दादा महाऋषि पुलस्त ने इस स्थान को धार्मिक महत्व प्रदान करवाया है।

यह कहा जाता है कि सतयुग में एक दिन जब महाऋषि पुलस्त ध्यान में बैठे हुए थे तो उन्हें अंतर आत्मा से इस बात का बोध हुआ कि कश्यप देश में पांचाल पहाड़ी श्रृंखला की गोद में वह स्थान है, जहां पर भगवान शिव ने पहली बार देवी पार्वती को अमरकथा सुनाई थी। इस बात का बोध होने के बाद महाऋषि पुलस्त अगले दिन वर्तमान श्री बूढ़ा अमरनाथ में आ पहुँचे जहाँ उन्होंने पत्थर की एक शिला में बनी इस छोटी सी गुफा में देवो के देव महादेव शम्भू भोलेनाथ के दर्शन प्राप्त करने के लिए घोर तप शुरू कर दिया।

कहते हैं कि भगवान के दर्शनों के लिए समाधि लगाये हुए महाऋषि पुलस्त को कई वर्ष बीत गये। तो ऐसे में एक दिन भगवान भोलेनाथ शंकर उनके तप से प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हो गये। भगवान को अपने सामने देखकर पुलस्त नतमस्तक होकर उनकी स्तुति करने लगे। "महादेव आप कृपालु हैं, दयालु हैं, आज इस स्थान पर आपके दर्शन कर मैं धन्य हो गया हूँ।" इस पर भोलेनाथ बोले — "हे वत्स, मैं तेरे तप से अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ। और तू मांग — क्या मांगना चाहता है।"

पुलस्त ने विनती करते हुए कहा — "जिसे आपने स्वयं दर्शन दिये हो उसे किसी और वस्तु की क्या आवश्यकता है। मैं तो आपको साक्षात देखकर धन्य हो गया। मेरा जीवन सफल हो गया है।" इस पर भी जब भगवान भोलेनाथ ने पुलस्त से बार-बार कुछ माँगने को कहा तो पुलस्त ऋषि भोलेनाथ से विनती करने लगे — "हे प्रभु, इस दास पर इतनी ही दया दिखलाना चाहते हैं तो नाथ, इस स्थल को जहाँ आपने मुझे अपने दर्शनों से कृतार्थ किया है, इसे ऐसा धार्मिक महत्व प्रदान करें कि युगों-युगों तक आपके भक्तजन यहाँ आते रहें।"

कहते हैं कि पुलस्त ऋषि के आग्रह पर भगवान भोलेनाथ ने मुस्कराते हुए "तथास्तु" कहा और स्वयं वहाँ अदृश्य हुए तो एक ही चट्टान की इस गुफा में भगवान शंकर का स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ जो कि देखने में एक सफेद चकमक की तरह था और उसकी बनावट चट्टान जैसी थी — जिसके कारण आज भी कई शिव भक्त इसे बाबा चट्टानी कहकर पुकारते हैं।

पुलस्त ऋषि को दिये वरदान स्वरूप स्वयंभू शिवलिंग के रूप में प्रकट होने के उपरान्त इस स्थान पर पुलस्त ऋषि ने वर्षों तक तप किया — जिसके चलते इस पूरे क्षेत्र का नाम पुलस्त नगरी पड़ गया, जो अपभ्रंश होते-होते आज पुंछ हो गया है। श्री बूढ़ा अमरनाथ मंदिर के साथ बहने वाली नदी का नाम पुलस्त गंगा पड़ा, जिसे आज भी पाप नाशिनी गंगा मानकर हजारों श्रद्धालु यहाँ पर स्नान करते हैं। श्री बूढ़ा अमरनाथ में भक्तों द्वारा मानी जाने वाली हर मन्नत को भगवान भोलेनाथ पूरा करते हैं।

श्री बूढ़ा अमरनाथ नाम कैसे पड़ा — रानी चन्द्रिका की कथा

महाऋषि पुलस्त की तपस्थली में भगवान शंकर के चट्टान के रूप में प्रकट स्वयंभू शिवलिंग का नाम श्री बूढ़ा अमरनाथ पड़ने के बारे में एक कथा प्रचलित है कि आज से करीब दो हजार वर्ष पूर्व पुंछ जिले का वर्तमान गाँव लोरन — जिसे उस समय लोवरकोट के नाम से जाना जाता था — तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य की राजधानी हुआ करती थी, जिसमें काबुल, कंधार, गिलगित और वर्तमान जम्मू-कश्मीर शामिल था। जिस पर उस समय रानी चन्द्रिका का शासन था। राजकाज में निपुण रानी चन्द्रिका अत्यन्त दयालु एवं शिव भक्त थी। रानी चन्द्रिका हर वर्ष श्रावण मास में लोवरकोट से कश्मीर स्थित श्री अमरनाथ गुफा में हिमलिंग की पूजा अर्चना के बाद ही व्रत तोड़ती थी।

कहते हैं कि एक बार जब रानी श्रावण मास में श्री अमरनाथ की यात्रा पर जाने की तैयारी कर रही थी कि अचानक मौसम खराब हो गया और देखते ही देखते क्षेत्र में भारी बर्फबारी होने से लोवरकोट से अमरनाथ जाने के सभी मार्ग बंद हो गए। जब काफी समय तक मौसम सही नहीं हुआ तो रानी चन्द्रिका ने यह सोचकर कि भगवान भोलेनाथ मेरी किसी भूल से रुष्ट हो गए हैं इसी सोच के चलते रानी चन्द्रिका ने अन्न जल का त्याग कर दिया। ऐसे में कुछ ही दिनों में रानी अत्यंत दुर्बल हो गई। चलने फिरने में असमर्थ रानी को पकड़कर शय्या से उठाया जाता था। रानी हर समय अपने कमरे में बंद पल-पल मृत्यु का इंतजार कर रही थी।

कि इसी बीच एक दिन रानी ने देखा कि उसके कमरे में एक बूढ़े साधू ने प्रकट होकर कहा — "तू अमरनाथ के दर्शन नहीं कर पाई, इसलिए इस प्रकार क्यों कष्ट उठा रही है? रानी, तेरे इस महल से 10 मील दूरी पर भगवान भोलेनाथ शिव का लुप्त स्थान है जिसके दर्शनों का लाभ भी श्री अमरनाथ के हिमलिंग समान है। तुम उसके दर्शन करो।"

कहते हैं कि भरी दोपहर में रानी को स्वप्न में बूढ़े बाबा के दर्शन दिए जाने के कुछ ही पल बाद महल के द्वार पर श्वेत वस्त्रधारी एक साधू ने अलख जगाई और भिक्षा की याचना की। जिस पर रानी की दासियाँ साधू को भिक्षा देने द्वार पर पहुँची तो साधू ने दासियों के हाथों भिक्षा लेने से इंकार करते हुए कहा कि हम भिक्षा तभी लेंगे जब रानी स्वयं अपने हाथों से भिक्षा देगी। साधू की बात सुनकर दासियाँ कहने लगीं — "महाराज आप ऐसा हठ न करें क्योंकि महारानी अत्यंत दुर्बल हैं, चलना फिरना तो दूर वह स्वयं बिस्तर से उठ भी नहीं सकतीं।" इस पर साधू नहीं माना और दासियों से कहा कि तुम जाकर रानी को मेरा हठ बताओ कि मैं उसके हाथों से ही भिक्षा लूँगा।

साधू की जिद पर जब दासियाँ महल में रानी के आवास में गईं तो उन्होंने देखा कि रानी अपने कमरे में पूरी तरह स्वस्थ खड़ी हैं। दासियों ने आश्चर्य के साथ रानी को देखते हुए उसे प्रणाम कर साधू का हठ बताया तो रानी तत्काल अपने हाथों से भिक्षा का थाल लिए जब द्वार पर पहुँची तो वहाँ खड़े साधू को देखकर हैरान हो गई कि जिस साधू ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए थे, वह उसके सामने खड़ा था। रानी को देखते ही साधू बोला — "तुम्हें मैंने जो बताया था, तुम्हें उसका स्मरण है?" रानी ने स्वीकृति में सर हिलाया तो साधू बोला — "फिर देर किस बात की है? चलो, भगवान भोलेनाथ के दर्शनों को चलें।"

रानी के आदेश पर कुछ ही क्षणों में राजमहल से रानी की पालकी के साथ सैनिकों का काफिला शोभा यात्रा के रूप में बूढ़े साधू के साथ चल पड़ा। दस मील महल से नीचे की तरफ चलने पर जब काफिला चीड़ और देवदार के घने वनों में पहुँचा तो साधू महात्मा ने अपने हाथ में पकड़े त्रिशूल से एक स्थान पर निशान लगाया। रानी की आज्ञा पर उस स्थान की खुदाई का कार्य शुरू किया गया। देखते ही देखते एक ही चट्टान का यह मंदिर — जिसे आज शिव पालकी कहा जाता है — दिखाई दिया, जिसमें चार द्वार बने हुए थे। जब पालकी के भीतर की सफाई की गई तो वहाँ पर भगवान शिव का चट्टानी शिवलिंग नजर आया।

कहा जाता है कि सफाई के बाद जब रानी चन्द्रिका उस बूढ़े साधू के साथ मंदिर में पूजा अर्चना के लिए प्रवेश किया तो पलक झपकते ही बूढ़ा साधू अदृश्य हो गया। साधू के अदृश्य होते ही रानी बड़ी ही करुणा से स्तुति करने लगी — "हे महादेव, आप स्वयं मुझे इस स्थान तक लाए, आप बूढ़े बाबा के रूप में मेरे साथ-साथ रहे और मैं अभागी आपको पहचान न सकी, आपकी महिमा जान न सकी। आपने बूढ़े के रूप में मुझे दर्शन देकर मेरे प्राणों की रक्षा की है।" उसी दिन से रानी इस स्थान को श्री बूढ़ा अमरनाथ कह कर पुकारने लगी — वही नाम आज भी पुकारा जाता है।

कहते हैं रानी चन्द्रिका को स्वयं भगवान शिव द्वारा दिखाया गया यह स्थान सैकड़ों वर्षों के बाद भगवान की महिमा से हुई प्राकृतिक उथल-पुथल और परिवर्तन से एक बार फिर अदृश्य हो गया था — जिसे दक्षिण भारत के एक साधू स्वामी चन्द्रचूढ़ मुनी ने उजागर कर वर्षों तक यहाँ तप किया था, जो कि आज तक भगवान शिव के भक्तों के लिए साधना का प्रमुख केन्द्र है। इस मंदिर के साथ ही पूर्व दिशा में स्वामी चन्द्रचूढ़ मुनी की समाधि बनाई गई है, जो कि भक्तों के लिए आस्था का केन्द्र है।

मंदिर और यात्रा की पूरी कथा को क्रम से पढ़ें

नीचे दिए गए पृष्ठ श्रद्धालुओं, परिवारों और यात्रियों के लिए अधिक उपयोगी और गहरी जानकारी प्रदान करते हैं।

स्पष्ट योजना

दर्शन, इतिहास और यात्रा की तैयारी एक ही स्थान पर

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